संग्रामसिंह सोनी परिचय

संग्राम सोनी[१]

 

संग्राम सोनी यह नाम जैन इतिहास में सुप्रसिद्ध है, अमर है। देशभक्ति, राज्यनिष्ठा, लोकसेवा, साधर्मिक भक्ति, श्रुतभक्ति और जिनभक्ति व गुरु उपासना की जब बात निकलती है तो अनेक नामों के बीच एक नाम उभरता है संग्राम सोनी का!

संग्राम सोनी के पूर्वजों में सांगण सोनी का नाम प्राप्त होता है। वे खंभात के रहनेवाले ओशवाल वंश के शिरोमणी श्रावक माने जाते थे। १४ वीं सदी के आरंभ में खंभात जब जैन परंपरा का समृद्ध केन्द्र बन चुका था। तब वहां उस समय के समर्थ जैनाचार्य देवेन्द्रसूरिजी और आचार्य विजयचन्द्रसूरिजी के बीच कुछ सैद्धांतिक बांतो को लेकर मतभेद पनपने लगे… बढने लगे तब सांगण सेठ ने ‘इन दोनों’ श्रमण शाखा मे सही और सार्थक शाखा कौन सी है? इस बात को लेकर पशोपश रही। अपने मन की उलझन को सुलझाने के लिए उन्होने अट्ठम तप करके अधिष्ठायक देव का जाप-ध्यान किया। शासनदेव ने आकर बताया कि ‘सांगण, आचार्य श्री देवेन्द्रसूरि वर्तमान युग के समर्थ व उत्तम श्रमण महात्मा है। उनका गच्छ -उनकी परंपरा काफी लम्बे अरसे तक चलेगी। इसलिए तुम उनकी उपासना करना।’ फिर सांगण और उसका परिवार, उसके स्वजन सभी आचार्य देवेन्द्रसूरिजी की सेवा में समर्पित हो गये। उन्हे रहने के लिए वसति-स्थान दियेयय श्रमण आचार के अनुकूल सुविधाएं जुटायी। तभी से आचार्य देवेन्द्रसूरिजी की परंपरा ’तपगच्छ की लघु पोशाल’ के रूप में प्रसिद्ध हुई। इसके बारे में गुर्वावली के श्लोक १३८/१३९ से जानकारी प्राप्त होती है।

सोनी सांगण यशस्वी था, संपन्न था और सूझबूझ का धनी था। किन्ही कारणों से वि.सं. १३५४, इस्वी १२९८ में सांगण ने खंभात छोडा और मालवांचल के मांडवगढ में आकर रहे। दिल्ही में उस समय (इस्वीसन १२९८ से १३१६) अलाउद्दीन खिलजी का राज्य था[२]। बाद में मांडवगढ में सोनी परिवार बसते चले और बढते चले। समृद्ध होने के साथ साथ उन्होने राज्यसत्ता में भी अपना सिक्का जमाया। राजाओं के साथ वे उनके मजबूत रिश्तों ने समाज-धर्म और संस्कृति को कुछ हद तक सुरक्षा प्रदान की और प्रगति भी दी। बाद में तो अनेक सोनी परिवार गुजरात के अलग अलग गांवों से आकर मांडवगढ में बसने लगे। उसका पुत्र पद्मराज हुआ, उसका पुत्र सूर हुआ, उसका पुत्र धर्मसेन हुआ और उसके बाद वरसिंह हुआ[३]

वरसिंह के नरदेव और धन(देव) नाम के दो पुत्र हुए[४]। धनसिंह ने चंद्रपुरी[५] में बहुत धन देकर लाखों लोगों को शकों के संकट से बचाया था[६]। नरदेव (नारिया) ज्येष्ठ पुत्र था। उसकी सोनाई नामकी पत्नी थी। मांडव में बादशाह हुसंगसेन[७] के दरबार में उसका बडा रुतबा था। मान-सन्मान था। वह दानी और उदार था। उसका यश चौतरफ फैल रहा था। उसने मांडव में एक सत्रागार सा बनाया था वहां पर सभी आगतुंकों को तरह तरह की वस्तुएं प्रदान की जाती थी[८]। उसके बारे में एक उल्लेख यह भी मिलता है किः

खंभात के रहनेवाले सोनी नारिया (नरेदव) के पुत्र पद्मसिंह की पत्नी आल्हगदेवी ने वि.सं. १४३८ में भादरवा सुद ७ के दिन तपागच्छ के आचार्य देवेन्द्रसूरिजी उनके पट्टधर आचार्य सोमसुंदरसूरीजी, आचार्य मुनिसुंदरसूरिजी आचार्य जयचन्द्रसूरिजी, आचार्य भुवनसुंदरसूरिजी के उपदेश से जीरावाला पार्श्वनाथ भगवान के जिनप्रासाद की चौकी का शिखर करवाया था।

उसका एक पुत्र था संग्रामसिंह[९]। जो संग्राम सोनी के नाम से इतिहास में जाना गया। वह कुछ समय के लिए व्यापार हेतु या अन्य कारणों से गुजरात के तत्कालीन वढियार इलाके के लोलाडा (वर्तमान में सुप्रसिद्ध तीर्थ शंखेश्वर के समीप का गांव) में जाकर रहने के पश्चात् वह मांडवगढ में आकर बसा। उस वक्त मालवा[१०] में महमूद खिलजी का शासन था (October 22, 1500- May 25, 1531)। संग्राम सोनी ने बादशाह के अत्यंत विश्वासु व्यक्तियों में अपनी जगह बना ली थी। इसके पीछे एक मजेदार कहानी इस तरह की है।

‘गुजरात के वढियार प्रान्त के लोलाडा गाँव से निकलकर संग्रामसिंह सोनी अपनी माता देवा पत्नी तेजा और पुत्री हांसी के साथ मांडवगढ गया। वहाँ पहुँचने पर वो नगर में प्रवेश कर ही रहा था कि उसने एक अचंभित करनेवाला दृश्य देखाः एक सर्प फैले हुए फन पर दुर्गा पक्षी आकर बैठी हुयी थी और किलकारी मार रही थी। प्रसन्नता जता रही थी। संग्राम इस शुकुन को देखकर जरा ठिठक सा गया। तभी समीप में खडे एक जानकार व्यक्तिने कहाः ‘सेठ, आराम से, निश्चिंत होकर शहर में प्रवेश करे। यह शुकुन बडी किस्मतवालों को मिलता है। ऐसे शुकुन से शहर में प्रवेश पाने वाला आदमी धन के ढेरों पर रहता है।’ और संग्राम सोनी ने अपने पुरखों की भूमि पर कदम रखा। फिर तो पीछे मुडकर देखने की फुरसत ही कहां रही! धीरे धीरे उसने व्यापार वगैरह में अपनी जगह बना ली। एक दिन बादशाह गियासुद्दीन गरमी के दिनों में बगीचे में गया और एक घटादर आम के पेड के तले विश्राम करने लगा। तब उसे माली ने बताया की यह आम तो बांझ है। इस पर फल नही लगते।’ बादशाह ने आननफानन माली को हुकम कर दिया कि ‘इस पेड को काट देना। बांझ आम की आवश्यकता क्या है?’ संग्रामसिंह तब वही उपस्थित था। उसने हाथ जोडकर बादशाह से गुजारिश कीः

‘बादशाह सलामत! यह आम का पेड तो पैदाईशी बांझ है। आप इसे मुझे बख्शीश कर दे। इसे बख्श दे। इस पेड के जीव को अभयदान देने की रहम करे। हजूर की मेहरबानी होगी और अल्लाताला की मंजूरी होगी तो यह पेड बज जाएगा। इतना ही नहीं अगले मौसम तक इस पर फल भी आ जाएंगे।’

बादशाह ने तुनककर कहाः ‘अगर अगले मौसम में इस आम पर फल नहीं आये तो में जो हाल इस पेड का करने जा रहा था, वह हाल में तेरा कर दूंगा।’ सोनी ने सिर झुकाकर सजदा करते हुए बादशाह सलामत की बात मान ली।

संग्रामसिंह दयालु था, धर्म की परंपरा में पूरी आस्था रखता था। धर्म के प्रभाव से वह परिचित था। उसने आम के पेड तले भगवान की मूर्ति रखकर स्नानपूजा पढायी। चंदन-धूप-फल वगैरह अर्पण कर वृक्ष की पूजा की। इसके प्रभाव से उस आम के वृश्र का अधिष्ठायक देव जाग्रह हुआ और संग्राम पर खुशी जाहिर करते हुए बोलाः ‘इस आम का जीव पूर्व जन्म में भी बांझ था और इस जन्मे में भी है पर तूने इसे अभयदान दिया है। बादशाह से इसकी जान बख्शायी है इसलिये मैं तेरे पर प्रसन्न हूं। इस पेड की जड के इर्दगिर्द काफी धन गडा पडा है। वह सब तू ले ले, वह तेरे नसीब का है। अब यह पेड बांझ नही रहेगा।’

संग्राम ने पेड के नीचे से सावधानी से धन निकाला और ले गया। कुदरत की करिश्माई कारीगरी कारगर हुई और मौसम के आते ही पूरा पेड आम के फल से लद गया। डालियाँ झुक गयी। संग्राम तो खुशी से नाच उठा। उसने आम के पके हुए फलो को उतारा और रजत थाल में सजाकर उपर रुमाल ढंक कर सुहागन महिला के सिर पर रखते हुए गाजे बाजे के साथ बादशाह के पास ले गया। बादशाह को नजराने के रूप में आम पेश किये और बताया कि ये उसी बांझ आम के फल है। बादशाह अत्यंत प्रसन्न हो उठा। उसने संग्राम को पाँच सुंदर कीमती वस्त्र इनाम देते हुए अपने महल का कामदार नियुक्त किया। बादशाह ने उसे नकद-उल-मुल्क की पदवी भी दी। उपरांत ‘जगतविश्राम’ बिरुद भी दिया।

श्री और सरस्वती के साथ उस पर सत्ता की कृपा भी पूरी उतरी। वह स्वयं तपगच्छ की वृद्ध पोशाल के आचार्य रत्नसिंहसूरि के पट्टघर पूर्व में भट्टारक आचार्य उदयवल्लभसूरि का श्रावक था।

इस्वी १४६२ में वि.सं. १५१८ के जेठ सुद १५ के दिन उसने भगवान अजितनाथ की परिकरवाली जिन प्रतिमा निर्मित की और उसे तपगच्छ की बडी पोशाल के आचार्य रत्नसिंहसूरिजी के पट्टधर आचार्य श्री उदयवल्लभसूरि के हाथों प्रतिष्ठा करवायी। इस प्रतिमा के नीचे के हिस्से में वस्त्रपट्ट है उसके नीचे सो. संग्राम नाम उत्कीर्ण है। मूलनायक भगवान की दोनों और भगवान अजितनाथ की मूर्तियां है। उज्जैन स्थित देश खडकी मोहल्ले में भगवान चन्द्रप्रभा स्वामी का श्वेतांबर जैन मंदिर है। उसमें भगवान अजितनाथ की श्वेत पाषाण की जो प्रतिमा बिराजमान है, उस की गादी के पिछले हिस्से में उपर्युक्त मतलब की लिखावट है।

सोनी संग्रामसिंह उन दिनों के प्रौढ प्रतिभाशाली एवं महाप्रभावक आचार्य सोमसुंदरसूरिजी के प्रति प्रगाढ आस्था रखते हुए उनकी आज्ञा पालन को अपने जीवन का श्रेष्ठ कर्तव्य समझते थे। उन्होंने मांडव में इस्वी १४७२ में भगवान सुपार्श्वनाथ का जिनप्रासाद बनवाया था। (आज भी ‘मांडवगढनो राजियो नामे देव सुपास’ यह पंक्ति सुप्रसिद्ध है।)

मक्षीजी तीर्थ में संग्रामसोनी ने पार्श्वनाथ भगवान को समर्पित जिनप्रासाद बनवाया। वि.सं. १५१८ के जेठ सुद १५, गुरुवार का दिन मक्षीजी तीर्थ की सालगिरह के दिन के रूप में प्रसिद्ध है। इसके अलावा भेई, मंदसौर ब्रह्ममंडल, सामलिया (सेमालीया) धार, नगर, खेडी, चंडाउली वगेरे १६ स्थानों में १७ बडे बडे जिन मंदिर बनवाये और अनेक धर्मकार्य किये।

संग्रामसिंह को श्रुत के प्रति भी अगाध भक्ति थी। उसने वि.सं. १४७०(इस्वी १४१४) में तपगच्छ गगन में सूर्य समान आचार्य सोमसुंदरसूरिजी को मांडवगढ में चातुर्मास करवाया। उस चातुर्मास में उसने उनके श्रीमुख से भगवतीसूत्र का सटीक श्रवण किया। भगवतीसूत्र में जगह जगह ‘गोयमा’ यह शब्द कुल मिलाकर ३६ हजार बार आता है, जब जब ‘गोयमा’ शब्द आया तब उस वक्त संग्राम सोनी ने एक सोनामुहर, उसकी माता ने आधी सोनामुहर, उसकी पत्नी के एक चौथाई (पावभर) सुवर्णमुद्रा रखकर उस परम पावन शब्द के प्रति अपना बहुमान व्यक्त किया। ३६+१८+९ कुल ६३ हजार सोनामुहरें आचार्य भगवंत के चरणों में रखते हुए उन्हे स्वीकार करने की विनती की। आचार्यश्री ने ‘साधु पैसों का परिग्रह नही रखते’ कहकर इस राशि का उपयोग शास्त्र-आगमग्रंथ लिखवाने में करने की प्रेदणा दी। सोनी संग्रामसिंह ने उस तमाम राशि का उपयोग करते हुए सोने-रुपे की स्याही से सचित्र कल्पसूत्र और कालिकाचार्य कथा की कई प्रतियां करवायी। आचार्य भगवंत के साथ के तमाम मुनिओं को एक-एक प्रति अर्पण की। और अन्य संघों के ज्ञान भंडार में भी अलग अलग जगह पर प्रतियां सुरक्षित रखी।

मांडवगढ में वैसे भी अनेक सोनी परिवार बसे हुए थे। वि.सं. १५४३ मे वहां सोनी मांडण, सोनी नागराज, सोनी वर्धमान, सोनी पासदत्त और सोनी जिनदास, सोनी गडरमल, सोनी गोपाल इत्यादि जैन परिवारों के बारे में उल्लेख प्राप्त होता है।

सोनी संग्रामसिंह धनी एवं दानी था साथ ही ज्ञानी था, कवि था और युद्ध भूमि पर अजेय वीर था।

मालवा के बादशाह मेहमूद ने दक्षिण के बादशाह निजाम शाह को जीतने के लिए वि.सं. १५२० में चैत्र सुद ६ के दिन शुक्रवार को, मांडवगढ से प्रयाण किया तब सोनी संग्राम भी उसके साथ गया था और बादशाह जब विजय प्राप्त करके वापस लौट रहा था तब गोदावरी के किनारे प्रतिष्ठानपुर (पैठण)[११] मे आया तब कवि संग्राम सोनी ने वहां के जिनप्रसाद में जिनेश्वर के दर्शन करके ‘बुद्धिसागर’ नामक संस्कृत भाषा के काव्य ग्रंथ की रचना की[१२]। जिसके ४ तरंग (विभाग) एवं कुल ४११ श्लोक की रचना की थी।

कुल मिलाकर संग्राम सोनी बारहव्रत धारी श्रावक था। सच्चरित्रवान पुरुष था। वह कवि कल्पतरु था। कवित्व ने बारे में उसे पूर्ण ज्ञान था।

अनेक ग्रंथो में अनेक आचार्य भगवंतो ने, रचनाकारों ने संग्राम सोनी के बारे में बहुत कुछ लिखा है। आज भी उनकी जिनभक्ति व श्रुतभक्ति कीर्तिकथाएं गायी जाती है। गिरनार महातीर्थ पर तो संग्रामसोनी की टूक के उपर सहस्रफणा पार्श्वनाथ भगवान का जिनालय आज भी उनकी कीर्ति को दोहरा रहा है। मालवी भाषा के लहजे में कहा जाए तोः

अणी रे जेरो कोई कोनी

जैसो वियो संग्राम सोनी

[१] जैन परंपरानो इतिहास भागः ३ से संकलित- संकलन एवं संवर्द्धनः भद्रबाहु विजय

[२] अलाउद्दीन खिल्जी दिल्ली सल्तनत के खिलजी वंश का दूसरा शासक था । उसने अपना साम्राज्य दक्षिण में मदुरै तक फैला दिया था। अलाउद्दीन ख़िलजी के बचपन का नाम अली ‘गुरशास्प’ था। जलालुद्दीन ख़िलजी के तख्त पर बैठने के बाद उसे ‘अमीर-ए-तुजुक’ का पद मिला। मलिक छज्जू के विद्रोह को दबाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने के कारण जलालुद्दीन ने उसे कड़ा-मनिकपुर की सूबेदारी सौंप दी। भिलसा, चंदेरी एवं देवगिरि के सफल अभियानों से प्राप्त अपार धन ने उसकी स्थिति और मज़बूत कर दी। इस प्रकार उत्कर्ष पर पहुँचे अलाउद्दीन ख़िलजी ने अपने चाचा जलालुद्दीन की हत्या 22 अक्टूबर 1296 को कर दी और दिल्ली में स्थित बलबन के लाल महल में अपना राज्याभिषेक सम्पन्न करवाया।

मालवा विजय मालवा पर शासन करने वाला महलकदेव एवं उसका सेनापति हरनन्द (कोका प्रधान) बहादुर योद्धा थे। 1305 ई. में अलाउद्दीन ने मुल्तान के सूबेदार आईन-उल-मुल्क के नेतृत्व में एक सेना को मालवा पर अधिकार करने के लिए भेजा। दोनों पक्षों के संघर्ष में महलकदेव एवं उसका सेनापति हरनन्द मारा गया। नवम्बर, 1305 में क़िले पर अधिकार के साथ ही उज्जैन, धारानगरी, चंदेरी आदि को जीत कर मालवा समेत दिल्ली सल्तनत में मिला लिया गया।

मृत्यु जलोदर रोग से ग्रसित अलाउद्दीन ख़िलजी ने अपना अन्तिम समय अत्यन्त कठिनाईयों में व्यतीत किया और 5 जनवरी 1316 ई. को वह मृत्यु को प्राप्त हो गया।

खिलजीकालीन भारत (गूगल पुस्तक ; लेखक – सैयद अब्बास रिजबवी)

[३] ढिल्यामल्लावदीने नरपतितिलके रक्षति क्ष्मामधीशे,सोनीश्रीसाङ्गणाख्यः समभवदुदितश्रीलसत्कीर्तिपूरः।

तत्पुत्रः पद्मराजः प्रथितगुणगणस्तत्सुतः सूरसंज्ञस्तत्सुनुर्धर्मनामा तदनु च वरसिङ्घोऽभवत् सत्यशीलः॥४०४॥ (बुद्धिसागर)

[४] नरदेवधनाख्यौ च तत्पुत्रौ द्वौ बभूवतुः। ओसवालकुलोत्तंसौ दीनानाथकृपाकरौ॥४०५॥(बुद्धिसागर)

[५] वर्तमान में चांडक, जो आबू की तलहटी में विमलमंत्री ने बसाई थी। जिसमें ३६० मंदिर थे।

[६] चन्द्रपुर्यां धनाख्येन वितीर्य विपुलं धनम्। मोचिताः शकसङ्कष्टान्नराः शतसहस्रशः॥४०६॥ (बुद्धिसागर)

[७] सन्.१४०५ में दिलावर खां का पुत्र अलप खां-होशंग खां घोरी के नाम से सत्ता में आया। उसने मांडवगढ (हाल-मांडू) को अपनी राजधानी बनाई। सन्.१४३५ में होशंग खां का निधन हो गया।

[८] तज्ज्येष्ठो नरदेव एव समभूत् ख्यातः क्षितौ मण्डपे, सत्रागारकरः सदोद्यतकरः सत्पात्रदः सर्वदः।

हूसङ्गक्षितिपालसंसदि सतां मान्यः परार्थैककृद्भाण्डागारधुरन्धरः स च परस्त्रीसोदरः सुन्दरः॥४०७॥ (बुद्धिसागर)

[९] जयत्ययं सम्प्रति तत्तनूजः सङ्ग्रामसिंहः सततं दयालुः। परोपकारैककरः सुशीलः सौजन्यसिन्धुर्जिनभक्तियुक्तः॥४०८॥ (बुद्धिसागर)

[१०] चौदहवी और पंद्रहवी शताब्दी में मुगल राज्यकाल दौरान मालवा भौगोलिक एवं सामरिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण देश था। नर्मदा और तापी नदी के बीच दक्षिण साम्राज्य का उत्तरपश्चिम भाग मालवा की सीमा में था। गुजरात से उत्तरभारत जानेवाला रास्ता और दक्षिणभारत से उत्तरभारत जानेवाला रस्ता मालवा से ही गुजरता था। इसी कारण किसी भी साम्राज्य के लिए मालवा को जितना महत्त्वपूर्ण था। मालवा का राजा उत्तरभारत के साम्राज्य के लिये एवं पूर्व पश्चिम और दक्षिणभारत के लिये भी महत्त्व रखता था। मालवा जब तक सशक्त था तब तक गुजरात, मेवाड और दिल्ली के लोदी राजाओं के साम्राज्य विस्तार की भावना में अंतराय था आंतरिक झगडों के कारण इ.स. १३०५ में मालवाने अल्लाउद्दीन खीलजी को हस्तक्षेप करने की प्रार्थना की तब से लेकर १४०१ तक वह दिल्ली के आधीन रहा।

मालवा के बहुतांश शासक हिंदुओं के विरोधी रहे। हिंदुधर्म के प्रति असहिष्णु रहे। महम्मद-खान-खीलजी (१४३६-१४६९) सं १४९२-१५२५. मालवा का सबसे शक्तिशाली शासक रहा। उसने बहोत सारे मंदिरों का नाश किया। वह अपने पडोसी राज्यों के साथ लडता रहा। उसका सबसे अधिक समय मेवाड के राणा कुंभा के साथ लडाइ करने में बीता।

Ref.1) History discussion.net, Rising of independent states during 14th 15th  century

Ref.2) Maharashtra state gazetteers’ general series 1.5 Yr.1972 ,Director-Government print stationary and publicaction. Pg.54,56,494

[११] पैठण महाराष्ट्र के इतिहास में विगत् २५०० वर्षों से अपना स्वतंत्र स्थान रखता है प्राचीन काल से यह गांव ‘दक्षिण काशी’ नाम से पहेचाना जाता है। पूर्व काल में इसका नाम प्रतिष्ठानपुर था। यह सातवाहन राजाओं कीराजधानी थी उस काल से लेकर अब तक पैठण के पंडितों का धर्मनिर्णय आखरी माना जाता है। आचार्य श्री भद्रबाहुस्वामीजी तथा वराहमिहिर पैठण से थे। आचार्य श्री हीरविजयसूरिजी मुनि अवस्था में यहां शास्त्र अभ्यास हेतु आये थे।

Reference – Google Wikipedia

[१२] नखेषु भू १५२० सम्मितविक्रमाब्दे पञ्चेभरामेन्दु१३८५ मिते च शाके। चैत्रस्य षष्ट्यां सितपक्षजायां शुक्रस्य वारे शशिभे गविन्दौ॥४११॥ (बुद्धिसागर)

चापोदये वीर्ययुतैश्च खेटैः श्रीमालवे महमूदभूपे। जेतुं महीपालनिजामसाहिं युद्धेन याते दिशि दक्षिणस्याम्॥४१२॥ (बुद्धिसागर)

लसत्प्रतिस्थानपुरेऽतिरम्ये गोदावरीतीरतरङ्गपूते। जिनं प्रणम्येह सुबुद्धिसिन्धुं सङ्ग्रामसिंहः कुरुते कवीन्द्रः॥४१३॥ (बुद्धिसागर)

श्रीमद्दक्षिणभूपतिं जितवतः कुम्भेभपञ्चाननस्योद्यद्गुर्जरगर्वपर्वतमहत्पक्षच्छिद्रो ग्राह्यः।

खल्वीश्रीमहमूदसाहिनृपतेर्विश्वासमुद्राधरः, सङ्ग्रामः स्वकलत्रमित्रविलसत्पुत्रैश्चिरं जीवतु॥४१४॥ (बुद्धिसागर)

 

दांत अने दोष

થોડા સમય પહેલા દાંતમાં દુખાવો થયો. ડૉક્ટરને પૂછ્યું દાંતના દુખાવાનું કારણ શું? ડૉક્ટરે સમજણ આપી આપણે ખોરાક લઇએ છીએ ત્યારે તેનો અમુક ભાગ દાંતમાં ભરાઇ જાય છે. બે દાંત વચ્ચે પોલાણ હોય ત્યાં ખોરાકના કણ જમા થાય છે. આ કણને સાફ ન કરવામાં આવે તો તે પથ્થર જેવો સખત થઇ જાય છે.તેમાં વિષાક્ત જંતુ ઉત્પન્ન થઇ જાય છે.સાથે જ તે નવા ખોરાકના કણને આકર્ષે છે.જથ્થો વધતા દાંતમા મૂળમાં પગપેસારો કરે છે. દાંતનું મૂળ તેમનો ખોરાક બને છે. વિષાક્ત જંતુઓને કારણે પેઢામાં સોજો આવે છે. સારવાર ન કરવામાં આવે તો દાંત પડી જાય છે.

દોષ પણ ખોરાકના કણ જેવા જ છે. દાંતમાં જેમ પોલાણ હોય છે તેમ મનમાં નબળાઇ હોય છે. મન સતત વિચારોનો ખોરાક લેતું રહે છે.તેમાંનો કોઇ એક વિચાર આપણી નબળાઇ સાથે જોડાઇ જાય ત્યારે દોષ બની જાય છે. લોભ આપણા મનની નબળાઇ છે. તેની સાથે પૈસાનો વિચાર જોડાય તો કંજૂસાઇ બની જાય. જાત સાથેનો અસંતોષ (સેન્સ ઑફ સૅલ્ફ ડિસ્સૅટિસ્ફેક્શન) મનની નબળાઇ છે તેની સાથે અપેક્ષાનો વિચાર જોડાય તો ક્રોધ બની જાય, સ્પર્ધાના વિચાર જોડાય તો ઇર્ષા બની જાય. આત્મસન્માનનો અભાવ (લેક ઑફ સેલ્ફ એસ્ટીમ) મનની નબળાઇ છે. તેની સાથે વિચાર જોડાય તો અભિમાન બની જાય.

એકવાર દોષ મનમાં પોતાની જગ્યા બનાવી લે પછી મજબૂત બનતો જાય છે. દોષ વિચારો પર કબજો જમાવવા માંડે છે.દુષ્ટતાને માફક આવે તેવા વિચારોને આકર્ષિત કરે છે. આ રીતે તે વધુ મજબૂત બને છે. પછી પોતાની અસર બતાવે છે. માનસિક અને શારીરિક નુકસાન થવા લાગે છે. દોષ જો વધુ સમય રહે તો મનને પૂરી રીતે ખરાબ કરી નાંખે છે. ખરાબ મન ખરાબ વિચારોનું ઘર બની જાય છે.

દાંતના દુખાવાથી બચવા ડૉક્ટર સલાહ આપે છે કે- દાંતના પોલાણમાં જમા થયેલા ખોરાકના કણને સાફ કરતા રહો. બ્રશ કરવાથી દાંતની બહારની સપાટી સાફ થાય છે. બે દાંતની વચ્ચે ભરાયેલા કચરાને સાફ કરવા વિશેષ બ્રશ આવે છે. તેના દ્વારા કચરો સાફ કરતા રહેવાથી આપોઆપ દુખાવો જતો રહે છે.

દોષ માટે પણ આ જ ગણિત લાગુ પડે છે.દોષ દૂર કરવા કોઇ દવાની જરુર નથી. મનની નબળાઇ સાથે એકરૂપ થઇ ગયેલા વિચારોને સાફ કરો. કામ થઇ જશે.

मध्यकालीन भारत में जैनधर्म

ई.स. १३०० से ई.स. १८०० तक ५०० साल का कालखंड मध्ययुग के नाम से प्रसिद्ध है। इस युग में भारत की धार्मिक परंपरा दो भाग में विभक्त थी। एक, हिंदुधर्म (सनातनधर्म) दो, जैनधर्म। इससे बहुत पहले ही बौद्धधर्म भारत से अदृश्य हो गया था। इस कालखंड में भारत ने समाज और संस्कृति के स्तर पर बहुत बडा परिवर्तन अनुभव किया। इस्लाम के आक्रमणने भारत की समूची जीवनशैली को बदल दिया। भारत में इस्लामिक आक्रमण चार खंड में हुआ। आरब, तुर्क, मुगल और अफघान। अलग अलग भूमि से आये हुए इस्लामिक आक्रांताओनें भारत को पराजित किया इतना ही नहीं भारत को सत्ता के बल पर इस्लामिक राष्ट्र बनाने का प्रयास भी किया।

भारत में इस्लामिक राज्य के दौरान जैनों की आबादी बडी मात्रा में कम हो गयी। भारतीय संस्कृति और धर्म के प्रतीक समान मंदिरों का विनाश किया गया या तो फिर उसे मस्जिदों में परिवर्तित किया गया[१]।  जैनधर्म भी इस्लाम की आंधी के चपट में आ गया। जैनधर्म के नेतृत्व की दूरदृष्टि के कारण इस विनाश से कुछ अंश में बचने में सफल हुआ। उस समय जैन धर्मावलंबियों की जनसंख्या पर्याप्त मात्रा में थी, जैन श्रेष्ठिओं का राजनैतिक प्रभुत्व था। जैन समाज तब भी आर्थिक रूप से अत्यधिक संपन्न था। अतः इस्लाम की आंधी का असर उत्तर भारत, मध्य भारत, दक्षिण भारत में हुआ पश्चिम भारत में असर कम हुआ।

यहां पर तत्कालीन ऐतिहासिक पार्श्वभूमि में भारत की राजनैतिक स्थिति को समजना प्रस्तुत होगा। सन् १२०६ में भारत के इतिहास में निर्णायक मोड आया जब दिल्ली की सल्तनत भारत की केंद्रवर्ती सत्ता बनी। अल्लाउद्दीन खीलजी (१२९६ से १३१६) के समय दौरान उत्तर भारत में राजपूतों की सत्ता का अस्त हुआ। नर्मदा नदी के किनारी राज्यों से लेकर दूर दक्षिण तक के विभिन्न क्षेत्र में विभिक्त राज्य इस विध्वंस को साक्षी बनकर देखते रहे। अल्लाउद्दीन खीलजी के बाद तुघलक वंश के सत्तासमय में दिल्ली सल्तनत ने निर्बलता, अनिश्चितता और उदासीनता से भरे राज्यों पर आक्रमण हुआ। तुघलक वंश का सत्ताकाल समाप्त होने पर जौनपुर, बिहार, बंगाल, गुजरात और मालवा में स्वतंत्र मुस्लीम राज्यों का उदय हुआ। पर इन सब स्वतंत्र आक्रांताओं के लिये परिस्थिति अनुकूल नहीं थी। पश्चिम भारत के राजपूत राजाओंने मुस्लीम आक्रांताओं की बर्बरता का कसके सामना किया और अपनी स्वायत्तता को बरकरार रखा। इस कालखंड में राजनैतिक परिप्रेक्ष्य में भारत के दो सत्ताकेंद्र थे। एक बहमनीओं का मुस्लीम साम्राज्य और दो, विजयनगर का हिंदु साम्राज्य। ईसा की सोलहवी शताब्दी में बहमन साम्राज्य का अस्त हो गया। किसी भी तरह से विजयनगर के साम्राज्य को परास्त करने में बहमनी साम्राज्य सफल हुआ था। ई.स. १५२६ में बाबर ने भारत पर हमला किया। उसके साथ ही मुगल साम्राज्य का प्रारंभ हुआ। दिल्ली और आगरा सत्ता के मुख्य केंद्र बनें। बाबर के पश्चात् उसका पुत्र हुमायूं (१५३० से १५४०, १५५५ से १५५६) अकबर (२७.१.१५५६ से २९.१०.१६०५) जहांगीर (१५.१०.१६०५ से ८.११.१६२७) शहाजहां (१९.१.१६२८ से ३१.७.१६५८) और औरंगझे(जे)ब (१६५८ से १७०७) शासक बने। औरंगझे(जे)ब के पश्चात् मुगल साम्राज्य का अस्त हुआ। परिस्थिति का फायदा उठाकर बहुत सारे क्षत्रप(शासक) स्वतंत्र हो गये। इसको अंतिम परिणाम स्वरूप ब्रिटीश हकुमत को भारत में सत्ता हासिल करने का मौका मिला।

यह मध्यकाल के इतिहास का सामान्य सर्वेक्षण है। यह कालखंड के इतिहास को एक या दूसरी तरह से जैन धर्मावलंबियोंने तथा जैन नेतृत्व के राजकीय संबंधों ने प्रभावित किया था। इस विषय पर कुछ विस्तृत विवरण प्रस्तुत है।

जैनधर्म बनाम दिल्ली सल्तनत।

लोदी वंश (१४५१ से १५२६) के राज्यकाल दौरान दिल्ली के सभी शासक तुर्कवंश के थे। वे इस्लाम के कट्टर अनुयायी थे और हिंदु और जैनियों के प्रति असहिष्णू थे। उनके अनुसार हर एक भारतीय काफिर था। अपने धार्मिक राजकीय और सामरिक हेतु को सिद्ध करने के लिये वे गैर-मुस्लिम का वध करने से और गैर-मुस्लिम की संपत्ति को लूटने में हिचकिचाते नहीं थे। वे पूरी तरह से मूर्ति के विरोधी थे। जैन और हिंदू मंदिरों को ध्वस्त करना, मूर्तियों को तोडना, देवधन को लूटना, हिंदू और जैन व्यापारीओं की संपत्ति को लूटना उनकी धार्मिक फर्ज का एक भाग था। यह विदेशी शासक हिंदू और जैन धर्मावलंबियों को अपने पवित्र धार्मिक स्थल बनाने की अनुमति नहीं देते थे। उनके संकुचित उलेमोओं के द्वारा दिये गये जड आदेश ही उनके लिये अंतिम शब्द थे। उनका पूरा लक्ष्य भारत को इस्लाम में परावर्तित करने का था। जो मुस्लीम होना स्वीकार नहीं करते थे उन के उपर बडा और भारी कर डाला जाता था और अन्य सैंकडो तरीकों से परेशान किया जाता था।

ऐसी विपरीत परिस्थितियों में भी जैन धर्मावलंबी निराश नही हुए। जैन प्रजा मधुरभाषी, विनयी, अनुवर्तनशील और बुद्धिशाली थी। अतः इन स्वार्थपरस्त और असहिष्णु शासक के द्वारा प्रारब्ध विनाश को कुछ हद तक रोकने में सफल हुई।

दिल्ली की हर एक सल्तनत के समय में जैनधर्माबलंबियों का निरंतर अखंड संबंध रहा था। इस के ऐतिहासिक साक्ष्य उपलब्ध है। शाहबुद्दीन महम्मद घोरी पर जैनाचार्य श्रीवसंतकीर्ति का प्रभाव था। जैन शास्त्रों में उस समय दिल्ली ‘योगिनीपुर’ नाम से प्रसिद्ध था। यहां पर बडे श्रीमंत परिवार रहते थे जिसमें अधिकांश ओसवाल वंश के थे।

उसी तरह अल्लाउद्दीन खिलजी (१२९६ से १३१६) जैसा असहिष्णु शासक भी दिगंबर मुनि श्रुतवीरस्वामीजी और श्वेतांबर आचार्य श्रीजिनचंद्रसूरिजी, यति श्रीरामचंद्रजी को समान सम्मान देता था।

अल्लाउद्दीन के पुत्र कुतुबुद्दीन मुबारकशा (१३१६-१३२०) के शासनकाल में खरतरगच्छ के आचार्य श्रीजिनचंद्रसूरिजी (तृतीय) सन् १३१८ में दिल्ली पधारे थे। वे पातशाह कुतुबुद्दीन से जैनतीर्थों की यात्रा करने का फरमान प्राप्त करने में सफल हुए थे। (अर्थात् गैरमुस्लिमों को अपने पवित्र मंदिरो की यात्रा पर सख्त प्रतिबंध था) आचार्यश्री का एक भक्त श्रावक ठक्कुर फेरु पातशाह की टंकशाला (जहां पर चलनी सिक्के बनाये जाते है) का प्रमुख था। (उसने ‘वास्तुसार’ नामक ग्रंथ की रचना की है।)

तुघलक वंश के शासकों पर जैनियों का ज्यादा प्रभाव था। आ.श्रीजिनचंद्र सू.(तृतीय) के पश्चात् आ.श्रीजिनकुशलसूरि उनके पट्ट पर आसीन हुए। ठक्कर फेरु के प्रभाव से ग्यासुद्दीन तुघलक (१३२० से १३२५) ने आ.श्रीजिनकुशलसूरिजी को गुजरात की तीर्थयात्रा करने का फरमान दिया। गुजरात की तीर्थयात्रा पूर्ण करके आ.श्रीजिनकुशलसूरिजी सिंधुदेश गये, जहां पर मुस्लीम राज्य था। उन्होंने अपनी अंतिम सांस सन् १३३२ में देवराजपुर में ली। उनके पट्ट पर आ.श्रीजिनपद्मसूरि आसीन हुए। ग्यासुद्दीन के शासनकाल में प्राग्वाट वंश के शूरा और वीरा नाम के श्रावक दिल्ली आये। उन्होंने सल्तनत में बडा पद प्राप्त किया। उसी समय में सुलतान ने फरमान जाहिर किया कि श्रीमाली श्रावक अपनी प्रतिमा की रथयात्रा के लिये गजपति ले सकते है।

ग्यासुद्दीन तुघलक का पुत्र महम्मद तुघलक सन् १२२५ से १३५१ तक दिल्ली का सुलतान रहा। महम्मद तुघलक उलेमाओं के प्रभाव में नहीं था अतः उसकी धार्मिक नीति सहिष्णु थी। अतः काष्टा संघ के आचार्य भट्टारक श्रीदुर्लभसेन (दिगंबर), नंदी संघ के श्रीभट्टारक रत्नकीर्ति, श्रीप्रभाचंद्र (दिगबंर) विविधतीर्थकल्प के कर्ता श्वेतांबर आचार्य श्रीजिनप्रभसूरि, आचार्य श्रीजिनदेवसूरि, यति श्रीमहेंद्रसूरि को पर्याप्त सम्मान मिला।

फिरोझ तुघलक (१३५१-१३८८) धर्मांध था। फिर भी दिगंबर भट्टारक श्रीप्रभाचंद्र, श्वेतांबर आचार्य श्रीरत्नशेखरसूरिने उस से सम्मान प्राप्त किया। आयुर्वेद के विशेषज्ञ रेखा पंडित को फिरोझ तुघलक मालवा के सुलतान ग्यासुद्दीन और अफघानसूरि शासकों से बहुमान प्राप्त हुआ।

तुघलक वंश के पतन के बाद दिल्ली में सैयदवंश का शासन स्थापित हुआ। उनका शासन सन् १४१४ से लेकर १४५० तक चला। फिर एकबार अग्रवाल श्रेष्ठी दिल्ली में आये। इस समय में दिगंबर भट्टारकों का विशेष सम्मान हुआ। अपभ्रंश भाषा के विख्यात कवि ‘रइधू’ ने दिल्ली में विशेष स्थान प्राप्त किया।

सैयद वंश के बाद दिल्ली पर लोदी वंश का राज्य हुआ। लोदी वंश के शासकों का जैनियों के साथ अच्छे संबंध रहे। सिकंदर लोदी के समय में देवराज चौधरी दिल्ली का मुख्य व्यापारी था। सुलतान ने उसके गुरु श्रीविशालकीर्ति (दिगंबर) का सम्मान किया था। दूसरे अग्रवाल साधारण नामक अत्यंत मेधावी थे। उन्होंने बादशाह के पास से अनेक फरमान प्राप्त किये।

गदाशाह नामक का श्रावक लोदी शासन में बडा अधिकारी था। बो बुंदेलखंड से था और विद्रोही था। उसने मूर्तिपूजा का विरोध किया। उसके विचारों का लोगों के उपर बहोत प्रभाव हुआ और परिणाम स्वरूप दिगंबर परंपरा में तरणपंथ का उद्गम हुआ। ऐसे ही प्रयास के फल स्वरूप श्वेतांबरपंथ में ‘लोकांमत’ का प्रारंभ हुआ। अपने धार्मिक मत के अनुकूल होने के कारण मुस्लिम शासकों ने इस विचारधारा को वेग दिया।

मुहम्मद तुघलक को छोडकर दिल्ली के सभी शासक कट्टर सुन्नी पंथ के थे। धार्मिक दृष्टि से यह बडे ही असहिष्णु थे। उन्होंने कोई हिंदु और जैन मंदिरों को नहीं छोडा, न मूर्तियों को छोडा। फिर भी भारत की अस्मिता का अस्तित्व बना रहा। जैन धर्मावलंबी अपने धर्म की आस्थामें अडिग साबित हुए। विपरीत परिस्थितियों में भी वे सम्मान और अनुकूल राजाज्ञा (फरमान) प्राप्त करने में सफल रहे। शिखरबद्ध मंदिर के विनाश होने पर भी उन्होंने गृहचैत्य बना करके प्रतिमा पूजा का प्रचलन चालु रखा।

गुजरात सल्तनत

गुजरात भारत के पश्चिम समुद्र किनारे पर है अतः पुरातनकाल से वह जैन धर्म का मुख्य केंद्र बना रहा। ईसा की तेरहवी शती के पूर्वार्ध में गुजरात को वस्तुपाल और तेजपाल जैसे श्रेष्ठी, और संघपति मीले। इस समय में गुजरात का विदेश के साथ व्यापारिक संबंध था। अतः जैन श्रेष्ठि धनिक थे। जामनगर, पोरबंदर, धोलेरा, ओखा, घोघा, भरुच, सुरत, गंधार जैसे बंदरो से विदेश व्यापार होता था। अतः जैन श्रेष्ठिओं ने मंदिरों का ध्वंस हो जाने के बाद भी उनका पुनर्निर्माण किया, नये मंदिर बने, सहस्रशः मूर्तियां बनी। नये साहित्य का सृजन हुआ, शास्त्रों का पुनर्लेखन हुआ। महम्मद गझनी(गजनवी) ने सोमनाथ मंदिर पर आक्रमण किया तब से गुजरात मुस्लीम आक्रांताओं का शिकार बनता रहा फिर भी गुजरात में तेरहवी शताब्दी के अंत तक हिंदु साम्राज्य अखंड रहा।

सन् १२९७ में अल्लाउद्दीन खीलजी ने गुजरात को दिल्ली सल्तनत के अधीन किया तब से गुजरात में दिल्ली सल्तनत द्वारा नियुक्त सुबेदारों का शासन रहा। गुजरात में अंतिम सुबेदार झा(जा)फर खां सन् १३९१ में नियुक्त हुआ। वस्तुतः वह स्वतंत्र शासक की तरह ही राज्य करता था फिर भी कानूनी तौर पर उसने सन् १४०१ में दिल्ली सल्तनत का त्याग कर अपने पुत्र ततर खां को नसीरुद्दीन महम्मद शाह नाम देकर गुजरात का स्वतंत्र शासक घोषित कर दिया। इतिहास यह गवाह देता है कि सन् १४०७ में झा(जा)फरखां ने स्वयं अपने पुत्र को जहर देकर मार डाला और स्वयं सुलतान महम्मद शाह नाम धारण कर लिया। अंततः उसके पुत्र अलप खां ने उसको जहर देकर उसी तरह मार दिया। अलप खां ने अहमदशाह नाम रखा और गुजरात का शासक बना। गुजरात के सुलतानो में अहमद शाह, महम्मद बेगडा, बहादुर शाह प्रसिद्ध हुए। इन्होंने सन् १४११ से लेकर सन् १५७२ तक गुजरात पर शासन किया। तत्पश्चात् गुजरात मुघल साम्रज्य का हिस्सा बन गया।

गुजरात के शासको ने भी हिंदू और जैन धर्मावलंबियों पर अत्याचार किये। उनके धार्मिक स्थल तोड दिये गये। फिर भी गुजरात में जैन धर्म का प्रसार अक्षुण्ण रहा। उसकी वजह श्रीमंत और प्रभाववंत जैन श्रेष्ठी थे। जैन श्रेष्ठिओं ने गुजरात के शासक और दिल्ली के सुबेदारों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध बनाये। जैनाचार्यों ने भी इस कार्य में बहोत प्रदान किया।

गुजरात में जैनधर्म के अस्तित्व को सुरक्षित रखने में जिनका महत्तम प्रदान है वैसे कुछ एक श्रेष्ठियों के नाम को जानना प्रस्तुत होगा। इन श्रेष्ठियों के नाम एवं प्रदान के विषय में जैन ग्रंथों में उल्लेख प्राप्त होते है। कुछ एक संदर्भ इस प्रकार है। आ.श्रीजिनप्रभसूरि कृत ‘विविधतीर्थकल्प’ आ.श्रीकनकसूरिकृत ‘नाभिनन्दनोद्धारप्रबन्ध’ ‘खरतरगच्छबृहद्गुर्वावली’ विद्यातिलकसूरिकृत ‘कन्यान्वय महावीर कल्प परिशेष’ प्रतिष्ठासोमकृत ‘सोम सौभाग्य काव्य’ इन ग्रंथो से मध्यकालीन इतिहास के विषय में उल्लेखनीय संदर्भ उपलब्ध होते है।

जैसे उपकेशी जैन श्रेष्ठि समराशाह (समरसिंह पिता का नाम देशक) का ग्यासुद्दीन तुघलक और अलप खां के साथ घनिष्ठ संबंध थे। उसकी प्रतिभा के कारण उसे कुतुबुद्दीन मुबारकशाह ने (दक्षिण भारत में) तेलंग का अनुशासक बनाया था।

उसने फरमान प्राप्त करके शत्रुंजय तीर्थ का जीर्णोद्धार किया था। इसी समय में जसलशाह नामक श्रेष्ठि ने सन्.१३१० में खंभात में अजितनाथ भगवान के मंदिर का निर्माण किया था। और भी श्रेष्ठियों के नाम उपलब्ध होते है जिन्होंने १५वी शताब्दी में जैन धर्म की सुरक्षा में महत्तम प्रदान किया था। पाहण के नरसिंह, वडनगर के देवराय, इडर के दो भाई विशाल और गोविंद, कर्णावली के वत्सराज, उपकेशी ओसवाल संघवी मांडलिक, पोरवाल संघवी साहशा, चित्रकूट के श्रावक कर्माशाह इत्यादि।

मध्यकाल में जैनधर्म के प्रभाव की सुरक्षा करने में श्वेतांबर संप्रदाय के भिन्न गच्छीय आचार्य भगवंतो का भी विशेष प्रदान रहा। खरतर गच्छ के आ.श्रीजिनचंद्र सू.(तृतीय), आ.श्रीजिनकुशल सू., जिनसागर सू., जिनहर्ष सू., जिनचंद्र सू., (चतुर्थ) तपागच्छीय आ.श्री जयकल्याण सू., जयचंद्र सू., रत्नशेखर सू., उपकेश गच्छ के कनकसूरि. अंचल गच्छ के मेरुतुंग सू., जयकीर्तिसूरि, जयकेसरी सू.।

१५वी शताब्दी के मध्यभाग में तपागच्छीय आ.श्रीसोमसुंदर सूरि और उनके शिष्य आचार्यश्री मुनिसुंदरसूरि और सुमतिसाधुसूरि ने जैनधर्म के प्रभाव की सुरक्षा के लिये प्रदान किया था।

जैन आचार्य, जैन श्रेष्ठियों की अति श्रद्धा और समर्पण और कार्यशैली को परिणाम से कट्टर मुस्लिमशासकों को भी तीर्थयात्रा, अहिंसा एवं मंदिर बनाने के फरमान जाहिर करने के लिये बाध्य होना पडा। जब मूर्तिभंजक सुलतान मंदिर और मूर्तियों का नाश करने की आज्ञा देते थे उसी समय जैन समाज उनके नाक के नीचे ही मंदिर निर्माण या जिर्णोद्धार में व्यस्त थे। विध्वंसक थक गये किंतु सर्जनकार थके नहीं।

इस समय में मानों की छोटे गृहमंदिर एवं धातु की छोटी मूर्ति और यंत्र के निर्माण कार्य में बाढ सी आयी। उस समय गुजरात में जैनियों की आबादी पालिताना, गिरनार, पालनपुर, तारंगा, अहमदाबाद, देवकुल पाटण इत्यादि शहर में ज्यादा थी। इन शहरों में नये ग्रंथो की रचना और पुराने शास्त्रों का पुनर्लेखन विपुल मात्रा में हुआ।

मालवा सल्तनत

मालवा के मध्ययुग का प्रारंभ परमारों के पतन से प्रारंभ होता है। परमारों का पतन इसा की १४वी शताब्दी के प्रारंभ में हुआ किंतु मालवा पर मुस्लीम आक्रमण का प्रारंभ बहोत पहले से हो चूका था। सन्.७२४ में आरब आक्रांता जुनैद ने मालवा पर हमला किया। इस आक्रमण को गुर्जर-प्रतीहार राजाओ ने परास्त किया। सन् ११९६ में कुतुबुद्दीन ऐबक ने मालवा की उत्तर सीमा तक कूच की थी वह वहीं से दिल्ली लौट गया।

मालवा के बूरे दिन तब शरु हुए जब सन् १२३५ में दिल्ली का दारु सुलतान शमसुद्दीन इल्तुमीश ने मालवा के उज्जैन और अन्य प्रांतों को लूंटा। सन् १३०५ में अल्लाउद्दीन खीलजी ने पूर्व मालवा के अंतिम राजा महलक दास(ह) को पराजित करके परमार शासन को समाप्त कर दिया। तब से सन् १४०१ तक मालवा दिल्ली की सल्तनत का ताबेदार रहा। तैमूर के आक्रमण के समय में मालवा की स्थिति अस्थिर और खराब थी तब मालवा के सूबेदार दिलावर खां घोरीने अपने आपको स्वतंत्र घोषित किया। सन्.१४०५ में दिलावर खां का पुत्र अलप खां-होशंग खां घोरी के नाम से सत्ता में आया। उसने मांडवगढ (हाल-मांडू) को अपनी राजधानी बनाई।

सन्.१४३५ में होशंग खां का निधन हो गया। उसका पुत्र महम्मद खां घोरी राजगद्दी पर आया। किंतु उसके मंत्री महम्मद खीलजी(प्रथम) ने उसको पदच्युत किया और मालवा में स्वतंत्र खीलजी शासन का प्रारंभ किया। सन्.१४६९ में उसका देहांत हुआ। उसके बाद क्रम से ग्यासुद्दीन-नसीरुद्दीन-महम्मद खीलजी(द्वितीय) मालवा के शासक हुए। किंतु इन शासकों का अधिकतर समय मेवाड के राणा थंभा और गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह के साथ युद्ध करने में ही बीता। गुजरात के सुलतान बहादुर शाह ने महम्मद खीलजी(द्वितीय) को हराया और मालवा के राज्य को अपने अधीन किया। मुघल बादशाह हुमायूं ने बहादुर शाह पर आक्रमण कर मालवा से भगाया। दुर्भाग्य से हुमायूं ने बहादुर शाह को पूरी तरह निर्मूल नहीं किया परिणामतः बहादुरशाह ने फिर मालवा जीता और वहां मलूक खां नामक सूबेदार को नियुक्त किया। मलूक खां ने गुजरात पर आक्रमण किया और मालवा को स्वतंत्र घोषित किया। किंतु यह स्वतंत्रता अल्प समय तक ही रही। सन्.१५१२ में दिल्ली के सुलतान शेरशाह सूरी ने मालवा पर आक्रमण किया। वहां पर सुजावत खां को सुबेदार बनाया। इस प्रकार मालवा फिर से दिल्ली सल्तनत के अधीन हुआ। शेरशाह के मृत्यु के बाद सुजावत खां ने अपने अपको स्वतंत्र घोषित कर दिया। उसने अपने तीन पुत्रों के लिये मालवा के तीन भाग किये परंतु मलिक बैजिद ने दो भाइओं से राज्य छीन लिआ और बाजबहादूर के नाम से पूरे मालवा का शासक हो गया।

अफघान सुल्तान बाजबहादूर भी बहोत समय राज्यसुख न पा सका। सन्.१५६२ में अकबर ने आदम खां और पीर महम्मूद नाम के दो सेनापतियों को मालवा जीतने के लिये भेजा। इन दोनो सेनापतिओं ने बडी बेरहमी से मांडवगढ को अपने हाथ में लिया और मालवा फिर से दिल्ली सल्तनत के अधीन हुआ।

मुघल राज्यकाल में अकबर-जहांगीर-शहाजहां और औरंगजेब का मालवा पर अधिकार रहा। अकबर के राज्य काल में आदम खां, अब्दूल खां, शियासुद्दीन, फकरुद्दीन मीर्झा शाहरुख, शिहब खां, नकीब खां उज्जैन के सुबेदार थे। जहांगीर के समय में उज्जैन का कारोबार मोमीद खां को हाथों में था।

औरंगजेब के समय में जफरखां और जसवंतसिंह मालवा के शासक रहे। औरंगजेब की मृत्यु के पश्चात् मराठों ने मालवा पर आक्रमण किया। मुगल सत्ता मालवा की सुरक्षा न कर सकी। मुघल सत्ता ने संधि की नीति अपनाई। अंततः सन्.१७४१ में मालवा पूर्णतः मराठा शासकों के अधीन हुआ।

सुल्तानों के शासन काल में जैन धर्मावलंबियों ने मालवा में बहोत तरक्की की। राजनैतिक, प्रशासनिक और नवनिर्माण जैसे सभी क्षेत्रो में जैन अधिकारी और जैनश्रेष्ठिओं की आवाज का वजन रहता था। सामाजिक क्षेत्र में भी उनकी आवाज का अनुभव होता था, उनकी आवाज सुनाई देती थी। इस समय में मालवा में सांस्कृतिक और प्रशासनिक क्षेत्र में दो व्यक्तित्व का सन्मान था वह थे कवि मंत्री मंडन और संग्राम सिंह। मालवा के इतिहास में इन दोनों को बहोत ही महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है।

इसके अतिरिक्त और भी उल्लेखनीय नाम है जिन्होंने मालवा को प्रभावित किया। जैसे—संघपति होलीचंद्र, झांझण शा, संघपति धनराज, धरणा शा, पूंजराज, नरदेव सोनी, मेघ, शिवराज, वक्कल, जावड शा इत्यादि दिगंबर भट्टारक को कभी मालवा को ऐतिहासिक प्रदान रहा है।

वर्तमान स्थिति में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि कट्टर धार्मिक असहिष्णू तुर्क शासकों ने जैन धर्मावलंबीओं को इतनी सुविधाएं क्यों दी? वे नये नये मुस्लीमों के प्रति सून्नीपंथ प्रति या तो शिया पंथी के प्रति उदार नहीं थे तो फिर जैनियों के प्रति उदार क्यों बने? सिर्फ लूंट और मंदिर तोडने को मझ(ज)हब समझनेवाले बर्बर, क्रूर और कट्टर शासकों के बीच जैन मंदिर, उपाश्रय ज्ञानभंडार, धर्मशाला आदि कैसे बच गये?

इसके कारण निम्नलिखित हो सकते है।

१) भारत में विदेशी आक्रांतोओं का प्रवेश होने के बाद मध्य एशिया और अफघानिस्तान की राजनैतिक एवं सामरिक परिस्थिति में परिवर्तन हो गया। भारत में सुलतानों ने अपने पैर जमा दिये थे और सत्ता और साम्राज्य को सम्हालने हेतु सेनापति और अमीरों की जरूरत थी। भारत में राज्यव्यवस्था और अनुशासन की जरूरत महसूस हो रही थी। मध्य एशिया और अफघानिस्तान की परिस्थिति में परिवर्तन होने से सेनापति, अधिकारी वर्ग, अमीरों का आगमन नहीं हुआ। भारत आये हुए अफघानों ने अपना नया कबीला बना लिया। अपनी अस्तित्व की रक्षा के लिये और महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिये वे भारत की प्रजा के साथ मीलने लगे। शास्ता के लिये सामरिक बल और प्रशासनिक व्यवस्था अनिवार्य होती है। अफघान शासकों को इन दोनो अनिवार्यताओं की पूर्ति के लिये धर्मपरिवर्तित हिंदु, राजपूत और जैनों का सहकार लेने के लिये विवश होना पडा। दूरप्रदेश तक सीमाओं की रक्षा हेतु राजपूतों की सहकार्य लेना पडा और जब लूट का धन खत्म हो गया तो आर्थिक व्यवस्था हेतु जैनियों का सहारा लेना पडा।

२) भारत में आये हुये विदेशी मुस्लिमों को अपने आपको भारत का कायमी निवासी बनाने के लिये भारतीय प्रक्रियासे गुजरना पडा, उनको लगा कि कानून और व्यवस्था बनावें रखने के लिये स्थानिक प्रजातंत्रका विश्वास जितना जरुरी है। मध्यकाल को राजनैतिक परिस्थिति के परिप्रेक्ष्य में संघर्ष, ईर्ष्या का वातावरण चारों और फैला हुआ था। लूंट और बर्बरता हदसे अधिक हो गई थी। ईस्लामी शासकों की युद्धनीति और ऐयाशीके कारण आर्थिक व्यवस्था पूर्ण रूप से बिखर गई थी। युद्ध में खर्च बहोत होता था, ऐयाशीके लिये वे बहोत घन लूंटाते थ। अतः राजकोश में धन की कमी हमेशा महेसूस होती थी। इसलिये उनको धनकी आपूर्ति के लिये धनिक वर्ग के पराधीन होना पडा, उस समय के धनपति अधिकतर जैन थे। इस्लामी शासकों ने उन्हें अपनी और आकर्षित किया उनको जीवन की और संपत्ति की सुरक्षा का विश्वास दिया। अतः मुस्लिमकाल में बहोत जैन परीवार प्रतिष्ठितवर्ग में गिने जाने लगे, जैनीओं के पास व्यापार-सम्बन्ध और व्यवस्था का अच्छा ज्ञान भी था, और वंश परंपरागत अनुभव भी था। इस क्षमता और बुद्धिमत्ता के बल पर उनको अधिकारी पद और सन्मान मिले, इस पदाधिकार का और शासनसेवा का उपयोग करते हुए जैनधर्मावलंबीओं ने नये मंदिरो का निर्माण किया, पुराने मंदिरों का जीर्णोद्धार किया और संघयात्रा के लिये फरमान प्राप्त किये। इस कार्य में श्रमणसंस्था का भी बहोत बडा प्रदान रहा।

३) तत्कालीन जैन समाज को भी मुस्लिमशासको की हकीकत प्रतीत हो गई थी, अगर वे सहकार न देते तो उनका सर्वस्व लूंट लिया जाता था, अपने धंधा-रोजगार-परिवार और धर्मस्थानकों को सुरक्षित करने हेतु जैन समाज शासकों की और उनके परिवार की जरुरत पूरी करने के लिये आगे आया, जैनीओं का व्यापार क्षेत्र छोटे गाँव से बडे शहर तक फैला हुआ था, उनका यह आर्थिक साम्राज्य राजनैतिक परिधिओं से परे था। इस लिये शासकवर्ग को भी व्यापारीवर्ग की कुछ शरतों को मान्य होने के लिये बाध्य होना पडा, उनको सुरक्षा देनी पडी।

दिल्ली की केन्द्रवर्ती सल्तनत बहोत ही अस्थिर रही, अतः बहोत सारे प्रादेशिक राज्य अस्तित्व में आये। इसके कारण सामरिक और शुल्क की अपेक्षाओं का अन्त हो गया। अब वें प्रजा को ज्यादा लूंट भी नहीं शकते थे, क्यों कि प्रजा के साथ और सहकार के उपर ही उनका अस्तित्व निर्भर था। इसके लिये एक तर्फ राजपूत जैसे क्षत्रिय समाज को महत्व देना अनिवार्य हो गया। दूसरी और जैन जैसे वैश्य समाज को हाथ पर रखना अनिवार्य हो गया। यही स्थिति अकबर से लेकर शाहजहाँ तक के मुगलशासकों की भी रही। औरंगजेब ने इस नीति का त्याग कर दिया, परिणामतः मुगलशासन का अन्त हो गया।

मुस्लीम शासकों के साथ जैनियों का संबंध देखकर और मुस्लीम काल में उनके धर्मस्थानों की अबाधा को देखकर पश्चाद्वर्ति कुछ एक विद्वानों ने ऐसी धारणा बना ली है कि जैनियों की इस देश को लूंटने वाले आक्रांताओं को साथ समझौता करके इस देश को लूंटने वालों को मदद की है। और वे हिंदू विरोधी थे। किंतु यह धारणा हकीकत पर नजर करने पर बेबूनियाद साबित होती है। जैन श्रेष्ठिवर्ग मुस्लिम शासकों के लिये धन एकत्रित करते थे यह बाह्य दिखावा था। वस्तुतः जैनों को इस कार्य हेतु बाध्य होना पडा था। मुस्लिम शासकों का उनके प्रति औदार्यभी विवशता के कारण ही था। जैन समाज अहिंसा में श्रद्धा रखता था। बलप्रयोग उनके खून में नही था। अतः वे हमेशा अपनी सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक, सुरक्षा के लिये शासकवर्ग का सहारा लेना था। भौगोलिक दृष्टि से जैनों का अपना स्वतंत्र प्रदेश नही था जहां वे खुद को महफूझ समज सके। यह भी भूलना नहीं चाहिए की जहां पर शासकों के साथ जैनियों के अच्छे संबंध रहे वहां हिंदू समाज के धर्म स्थानों का विनाश कम हुआ। मालवा और अन्य क्षेत्रों में यह हकिकत नजर आती है। इतना ही नहीं जब भी प्रजा पर आपत्ति आयी तब भामाशा, जगडूशा जैसे श्रेष्ठियों ने सभी धर्म के लोगों के लिये अपने अन्नक्षेत्र खुले रखे थे।

मध्यकालीन इतिहास का इतना विहंगावलोकन करने के बाद संग्रामसिंह के इतिहास पर नजर करेंगे। वस्तुतः यह इतिहास संग्रामसिंह की पार्श्वभूमि जानने के लिये उपयुक्त है। संग्रामसिंह ने अपने ग्रंथों में अपना परिचय दिया है और पट्टावलीयों में उनके कार्य प्रभाव का वर्णन उपलब्ध होता है। उसके अनुसार उनका जीवनवृत्त हम जान सकते है। बुद्धिसागर में संग्रामसिंह ने दक्षिण में निझामशाह के साथ युद्ध का उल्लेख किया है। उसकी ऐतिहासिक सामग्री इस प्रकार है।

गुजरात और बीजापुर के बीच वायव्य दक्षिण प्रांत में स्थित भारतीय राज्य अहमदनगर सल्तनत के नाम से प्रसिद्ध है। मध्यकाल के अंतिम चरण में उसका उदय हुआ। जुन्नर के शासक मलिक अहमद ने बहमन सेनापति को हराकर सन् १४९०के २८ मई के दिन अपने आप को स्वतंत्र घोषित किया और अहमदनगर का सुलतान बना। मलिक अहमद निझाम-उल-मुल्क मलिक हसन बहरी का पुत्र था। पिता के मृत्यु के बाद उसने पिता की याद में निझामशाही वंश का प्रारंभ किया। पहले सकी राजधानी जुन्नर थी किंतु सन् १४३३ में अहमदनगर की नींव रखी। सन् १५१० में मलिक अहमद की मृत्यु हुई[२]। बुद्धिसागर के अनुसार महमद खीलजी दूसरा और निझामशाही विक्रम संवत् १५२० में अर्थात् ईसवीय सन् १४४४ में हुआ था। अतः यह युद्ध निझाम-उल-मुल्क मलिक हसन बहरी (मलिक अहमद के पिता) के साथ होने की संभावना है।

[१] इस विषय की विशेष जानकारी के लिये देखो संदर्भ- हिंदुमस्जिद, ले. प्रफुल्ल गोरडिया,प्रका.नवभारत साहित्य मंदिर।

[२] The Ahmadnagar Sultanate was a late medieval Indian kingdom, located in the northwestern Deccan, between the sultanates of Gujarat and Bijapur. Malik Ahmad, the Bahmani governor of Junnar after defeating the Bahmani army led by general Jahangir Khan on 28 May 1490 declared independence and established the Nizam Shahi dynasty rule over the sultanate of Ahmednagar.[2] Initially his capital was in the town of Junnar with its fort, later renamed Shivneri. In 1494, the foundation was laid for the new capital Ahmadnagar. In 1636 Aurangzeb, then Mugal viceroy of Deccan finally annexed the sultanate to the Mughal empire

Malik Ahmad was the son of Nizam-ul-Mulk Malik Hasan Bahri. After the death of his father, he assumed the appellation of his father and from this the dynasty found by him is known as the Nizam Shahi dynasty. He founded the new capital Ahmadnagar on the bank of the river Sina. After several attempts, he secured the great fortress of Daulatabad in 1499.

After the death of Malik Ahmad in 1510, his son Burhan, a boy of seven was, installed in his place. In the initial days of his reign, the control of the kingdom was in the hands of Mukammal Khan, an Ahmadnagar official and his son. Burhan Shah I died in Ahmadnagar in 1553.

साधक अने संशोधक

સાધક અને સંશોધક


દીક્ષાનું એ બારમું વર્ષ હતું. બાર વરસ ગુરુવરોની નિશ્રામાં વીતાવ્યા બાદ અચાનક જ સ્વતંત્ર વિહાર થયો. સુ. મનસુખભાઈની પ્રેમાળ વિનંતિથી વલસાડ આવ્યા. આરાધકોના અતિશય આગ્રહથી વ્યાખ્યાન કરવાનું હતું. વ્યાખ્યાન કરવાની આદત ન હતી. મન ન હતું. સંકોચ હતો. સંકોચ કરતા વધારે ડર હતો. મને નહીં આવડે તો? જવાબદારીમાંથી છટકવાના રસ્તા શોધ્યા પણ મળ્યા નહીં.

બીજા દિવસે વ્યાખ્યાન કરવાનું હતું. આગલા દિવસે શ્લોક ન મળે. ઘણી મહેનતને અંતે પંદર મિનીટનું વ્યાખ્યાન તૈયાર થયું. વલસાડના લોકોએ સહાનુભૂતિપૂર્વક સાંભળ્યું. પૂ.આ.શ્રી ભદ્રબાહુ સ્વામીની આવશ્યક નિર્યુક્તિની એક ગાથાનો આધાર લઈ વિવરણ ચાલતું હતું. કેંદ્રસ્થાને ‘આત્મા’ હતો. અઠવાડિયામાં હવા બંધાઈ. કેટલાક આત્મજિજ્ઞાસુ શ્રોતાઓ મળવા આવ્યા. તેમની સાથે ‘વિપશ્યના’ વિષે ચર્ચા થઈ. સ્વાભાવિક રીતે જ નજીકમાં વિરાજમાન પૂ.મુ.શ્રી અમરેંદ્રવિજયજી મ.નો ઉલ્લેખ થયો. તેમને મળવાનો આગ્રહ થયો પણ હું જઇ શકું તેમ ન હતો.

આ વાત થઈ તે દિવસે સાંજે જ એક મહાત્મા વિહાર કરીને પધાર્યા. પ્રતિક્રમણ પછી તેમને વંદના કરવા અને શાતા પૂછવા ગયો. ઉપાશ્રયમાં મચ્છર ઘણા હતા. તેથી મહાત્મા માથા પર કપડું નાંખી ધ્યાનાવસ્થામાં બેઠા હતા. મત્થએણ વંદામિના શબ્દથી તેમણે ધ્યાન પૂરું કર્યું. કપડું દૂર કર્યું. પરસ્પર નામ પૂછ્યું. તેમણે કહ્યું – ‘ભુવનચંદ્ર. ખાસ તમને મળવા જ આવ્યો છું. આત્મા અને વિપશ્યના વિષે વાત કરવા આવ્યો છું.’

ઉપા.શ્રી ભુવનચંદ્રજી મ.નો આ પહેલો પરિચય. સાવ નાના અને નવોદિત સાધુ ભગવંતને સામેથી મળવા માટે જવું અને તે પણ આત્મા અને ધ્યાન જેવા વિષયની વાત કરવા માટે જવું આજના કાળમાં દુર્લભ ગણાય. મને સુખદ આઘાત અને આશ્ચર્ય થયા. તે રાત્રે મોડે સુધી આત્મા અને વિપશ્યના પર વાતો થતી રહી. બીજે દિવસે સવારે હું પરવાર્યો ત્યારે તો મહાત્મા વિહાર કરી ચૂક્યા હતા. તેમની આ મુલાકાત મન પર ઉદાત્તતાની અમીટ છાપ છોડી ગઇ.

ઉપા.શ્રી ભુવનચંદ્રજી મ.નો બીજો પરિચય પુસ્તક દ્વારા થયો. પૂ.આ.શ્રી સિદ્ધસેન દિવાકરસૂ.મ.ની રચેલી એકવીશ દ્વાત્રિંશિકાઓમાં એક દ્વાત્રિંશિકામાં આજીવક સંપ્રદાયના નિયતિવાદની સમીક્ષા કરવામાં આવી છે. આજીવક સંપ્રદાય ગોશાલકે પ્રવર્તાવેલો છે. આગમોમાં અને શાસ્ત્રોમાં આજીવક સંપ્રદાય વિષે છૂટાછવાયા ઉલ્લેખ મળે છે, સળંગ નિરૂપણ નથી. ઉપા.શ્રી ભુવનચંદ્રજી મ.એ નિયતિ દ્વાત્રિંશિકામાં આ મતનું સ્પષ્ટીકરણ કર્યું છે. લુપ્ત થઇ ગયેલી મતધારાઓને જોઇને આનંદ થયો. આંશિક વચનોના આધારે એક દર્શનને રજૂ કરવું કેટલું પડકારજનક કામ છે તે દર્શનશાસ્ત્રનો અભ્યાસી જ જાણી શકે.

ઉપા.શ્રી ભુવનચંદ્રજી મ.ના ત્રીજા પરિમાણનો પરિચય ‘અનુસંધાન’માં તેમના દ્વારા લખાતી ગ્રંથ સમીક્ષા દ્વારા થયો. પ્રાચીન હસ્તપ્રતોના પાઠને નિર્ધારણ કરવા એ કઠિન કાર્ય છે. સમીક્ષિત સંપાદન માટે બહુ મોટી સજ્જતા જોઈએ. લિપિ, ભાષા, હસ્તપ્રતોની લખાણ પદ્ધતિ, વિષય, તત્કાલીન સમાજ, ઈતિહાસ, જેવા વિષયોનું ઉંડું જ્ઞાન જોઈએ. પૂ.ઉપા.મ. પાસે એવી સજ્જતા છે. તેઓ ઝીણવટપૂર્વક પાઠને તપાસી શકે છે અને સુધારી શકે છે. એટલું જ નહીં તેમનું જ્ઞાન નક્કર છે એટલે તેઓ આત્મવિશ્વાસ સાથે તટસ્થ અને તથ્યપરક સમીક્ષા કરી શકે છે. તેમની સમીક્ષાઓ સ્પષ્ટ હોય છે. પૂ.આ.શ્રી વિ.શીલચંદ્ર સૂ.મ. તેમના પરમ મિત્ર છે. તેમના જ મુખપત્રમાં તેમના શિષ્યપરિવારે સંપાદન કરેલા પુસ્તકમાં તેઓ ભૂલ બતાવી શકે છે. (અને હા, પૂ.આચાર્યભગવંત તે છાપે પણ છે) આજકાલ આવી સમીક્ષાઓ થતી નથી.

પૂ.ઉપા.શ્રી ભુવનચંદ્રજી મ. પાસે પ્રાચીન હસ્તપ્રતોના પાઠનિર્ધારણની વિલક્ષણ શક્તિ છે. આવી પ્રતિભા બહુ જ જૂજ વ્યક્તિમાં જોવા મળે છે. તેમની આ પ્રતિભાનો વર્તમાન શ્રમણસંઘે લાભ ઉઠાવવા જેવો છે.

પૂ.ઉપા.શ્રી ભુવનચંદ્રજી મ. નો અંતિમ પરિચય ‘શ્રુતભવન સંશોધન કેંદ્ર’ના માધ્યમે થયો. શાસ્ત્રોનું સંશોધન કરવા કઈ કઈ કાળજી લેવી જોઇએ તેનું ખરૂં માર્ગદર્શન તેઓ આપતા રહે છે. ‘વર્ધમાનજિનરત્ન કોશ’માં ભારતભરની હસ્તપ્રતોની માહિતી એક સ્થળમાં એકત્રિત કરવાના પડકારો, ભયસ્થાનો કેવા છે તે તેમણે જણાવ્યું. એટલું જ નહીં શ્રી પાર્શ્વચંદ્રસૂ. (પાયચંદ) ગચ્છના હસ્તપ્રત ભંડારોના સૂચિપત્ર તેમણે ઉલટથી મોકલી આપ્યા. ઘણાં સૂચિપત્રો તેમણે સ્વયં તૈયાર કર્યા છે. શ્રુતભવન સંશોધન કેંદ્ર અને વ્યક્તિગત રૂપે મારા માટે તેઓ ખરા અર્થમાં માર્ગદર્શક બની રહ્યા છે.

સંખ્યાની દૃષ્ટિએ એક નાના સરખા સમુદાયમાં દીક્ષિત થઈને એકલપંડે જ્ઞાનના શિખરોને સર કરવાનું વીરકાર્ય જેવીતેવી સિદ્ધિ નથી. તેમના સંયમજીવનની સુવર્ણસિદ્ધિ પ્રસંગે તેમની ધ્યાનરૂચિ, સંશોધનરુચિ, શાસ્ત્રરૂચિ અને પરોપકારપરાયણતાને હૃદયથી અભિવંદન.

મ.સુ.૪, ૨૦૭૩,

શ્રુતભવન.

– વૈરાગ્યરતિવિજય